Sunday, 8 May 2011
अभी तो मैं जिंदा हूँ
एक भीड़ सी लगी थी शायद मर गया था कोई,
जनाजा उठाने को तैयार न था कोई ,
क्योंकि उस मासूम का परिवार न था कोई,
देखा था मैंने,उसको कई दोस्तों के साथ ,
सोचा था,जनाजा तो उठाएंगे वे ही हाथ,
जब कोई न आया,तो यह आवाज सी आयी,
चलो,निकल चलो,की कही उठाना न पड़े,
वो दोस्त थे,जो चुपके से निकल पड़े,
कफ़न गीला हुआ आँखों से,मुर्दा रो रहा था!
मुर्दा खड़ा हुआ कफ़न में लिपटे हुए,
पहुंचा दोस्तों तक जो जा रहे थे सिमटे हुए,
कंधे पर र४अख हाथ तो यारो का दिल डोला!
कफ़न हटा दिया मुर्दे ने रो रो कर यह बोला,
मरने पर न दोगे कन्धा,ये देखकर शर्मिंदा हूँ ,
मैंने तो नाटक किया था यारो,अभी तो मैं जिंदा हूँ ...
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sach kahne wale yaar dost koi aur hote hai aur karne wale koi aur..
ReplyDeletebahut sundar prerak rachna..
aapne mere blog post par sakaratmak teep di yah mujhe bahut achhi lagi.. aisi soch hi kuch kar dikhne ka jajba rakhte hai..
haardik subhkamnayen..
शुभकामनाओ के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ..मुझे विश्वास है की आप सभी की शुभकामनाये मेरे इस जज्बे को हमेशा बनाये रखने में और एक दिन कार्य में परिणित
ReplyDeleteकरने में सहायक होगी.