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Sunday, 8 May 2011

मेरी माँ को समर्पित


महाराजा चन्द्रगुप्त के महामंत्री चाणक्य अपने अर्थशात्र के कारण विश्वं प्रसिद्ध थे! वह चारो वेदों के ज्ञान,शास्त्रों में पारंगत और निति निपुण माने जाते थे! वे माता पिता का बहुत सम्मान करते थे ! एक दिन उनकी माता विचारो में डूबी हुई थी !माँ को दुखी देखकर उन्होंने अपनी माँ से चिंता का कारण पूछा! वह भावुकता से बोली -पुत्र तुम इतने भाग्यशाली और योग्य हो की विश्व स्तर रूप से एक दिन राज सिंहासन प्राप्त कर लोगे, मैं तुम्हारे शरीर पर अंकित राज्य लक्ष्मी ही देख रही हूँ ! राजाओ के उच्चारण में दर्द तो होता है पर निर्मल स्नेह नहीं होता !

सोचती हूँ की तुम राजा होने पर अपने माँ को भूल जाओगे तो मैं अभागी किसके बल पर जीवित रहूंगी? चाणक्य ने क्षण भर सोचा और फिर पूछा माँ तुम मेरे शरीर के किस अंग में राज श्री देखती हो?माँ ने उत्तर दिया तुम्हारे दांतों में !

चाणक्य तुरंत एक हथोड़ी लेकर आया, माँ के देखते ही देखते अपने सभी दाँत तोड़ डाले! मुहं खून से लथ पथ हो गया परन्तु चाणक्य की आँखों में संतोष झलक रहा था! माँ चीख पड़ी-"यह क्या किया पुत्र?" चाणक्य शांति से बोला मैंने उचित ही किया है माँ जिस चिहन से मुझे राजपद मिले मै उसे निर्मूल कर दूंगा! जननी के चरणों का राज्य छोड़कर मुझे कोई राज्य नहीं चाहिए..

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