तेरा आशियाना मालूम है मुझे और ..
राहों में टकराना भी अच्छा लगता है !!
यूँ पलकों को उठाना ,यूँ नजरो को मिलाना ..
तेरी आँखों में डूब जाना भी अच्छा लगता है !!
यूँ नजरो को बचाना,यूँ पलकों को झुकाना
शरमा कर तेरा मुस्कुराना भी अच्छा लगता है !!
कहा तुझसे कभी कुछ भी नहीं और
तुझसे बतियाना भी अच्छा लगता है !!
जुस्तजू नहीं है मुझे तेरी और
इत्तिफ़ाक़न तुझे पाना भी अच्छा लगता है !!
आरजू भी नहीं है मिलने की तुझसे और
ख्वाबों में तेरा आना भी अच्छा लगता है !!
हकीकत से हूँ वाकिफ़ मैं और
तेरे इंतज़ार में रहना भी अच्छा लगता है !!
तू नही मुझे हासिल जानता हूँ मैं और
आब-ए-चश्म लिए मुस्कुराना भी अच्छा लगता है !!
नींदों से नहीं अब ताल्लुकात कुछ भी और
रातो को करवटें बदलना भी अच्छा लगता है !!
कुछ यूँ खो गया तसव्वुर में मैं तेरे की
खोना भी अच्छा लगता है,तुझे पाना भी अच्छा लगता है !
गज़लों में तुझे अब गुनगुनाना भी अच्छा लगता है !!
(प्रतीक त्यागी )
No comments:
Post a Comment