Sunday, 8 May 2011
अभी तो मैं जिंदा हूँ
एक भीड़ सी लगी थी शायद मर गया था कोई,
जनाजा उठाने को तैयार न था कोई ,
क्योंकि उस मासूम का परिवार न था कोई,
देखा था मैंने,उसको कई दोस्तों के साथ ,
सोचा था,जनाजा तो उठाएंगे वे ही हाथ,
जब कोई न आया,तो यह आवाज सी आयी,
चलो,निकल चलो,की कही उठाना न पड़े,
वो दोस्त थे,जो चुपके से निकल पड़े,
कफ़न गीला हुआ आँखों से,मुर्दा रो रहा था!
मुर्दा खड़ा हुआ कफ़न में लिपटे हुए,
पहुंचा दोस्तों तक जो जा रहे थे सिमटे हुए,
कंधे पर र४अख हाथ तो यारो का दिल डोला!
कफ़न हटा दिया मुर्दे ने रो रो कर यह बोला,
मरने पर न दोगे कन्धा,ये देखकर शर्मिंदा हूँ ,
मैंने तो नाटक किया था यारो,अभी तो मैं जिंदा हूँ ...
मेरी माँ को समर्पित
महाराजा चन्द्रगुप्त के महामंत्री चाणक्य अपने अर्थशात्र के कारण विश्वं प्रसिद्ध थे! वह चारो वेदों के ज्ञान,शास्त्रों में पारंगत और निति निपुण माने जाते थे! वे माता पिता का बहुत सम्मान करते थे ! एक दिन उनकी माता विचारो में डूबी हुई थी !माँ को दुखी देखकर उन्होंने अपनी माँ से चिंता का कारण पूछा! वह भावुकता से बोली -पुत्र तुम इतने भाग्यशाली और योग्य हो की विश्व स्तर रूप से एक दिन राज सिंहासन प्राप्त कर लोगे, मैं तुम्हारे शरीर पर अंकित राज्य लक्ष्मी ही देख रही हूँ ! राजाओ के उच्चारण में दर्द तो होता है पर निर्मल स्नेह नहीं होता !
सोचती हूँ की तुम राजा होने पर अपने माँ को भूल जाओगे तो मैं अभागी किसके बल पर जीवित रहूंगी? चाणक्य ने क्षण भर सोचा और फिर पूछा माँ तुम मेरे शरीर के किस अंग में राज श्री देखती हो?माँ ने उत्तर दिया तुम्हारे दांतों में !
चाणक्य तुरंत एक हथोड़ी लेकर आया, माँ के देखते ही देखते अपने सभी दाँत तोड़ डाले! मुहं खून से लथ पथ हो गया परन्तु चाणक्य की आँखों में संतोष झलक रहा था! माँ चीख पड़ी-"यह क्या किया पुत्र?" चाणक्य शांति से बोला मैंने उचित ही किया है माँ जिस चिहन से मुझे राजपद मिले मै उसे निर्मूल कर दूंगा! जननी के चरणों का राज्य छोड़कर मुझे कोई राज्य नहीं चाहिए..
Thursday, 5 May 2011
माँ तो सबकी एक-जैसी होती है
बस से उतरकर जेब में हाथ डाला। मैं चौंक पड़ा।जेब कट चुकी थी। जेब में था भी क्या? कुल नौ रुपए और एक खत, जो मैंने माँ को लिखा था कि—मेरी नौकरी छूट गई है; अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा। तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था। पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था। नौ रुपए जा चुके थे। यूँ नौ रुपए कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए नौ रुपए नौ सौ से कम नहीं होते। कुछ दिन गुजरे। माँ का खत मिला। पढ़ने से पूर्व मैं सहम गया। जरूर पैसे भेजने को लिखा होगा।लेकिन, खत पढ़कर मैं हैरान रह गया। माँ ने लिखा था—“बेटा, तेरा पचास रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे!…पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता।” मैं इसी उधेड़-बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा? कुछ दिन बाद, एक और पत्र मिला। चंद लाइनें थीं—आड़ी-तिरछी। बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया। लिखा था-“भाई, नौ रुपए तुम्हारे और इकतालीस रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है। फिकर न करना
माँ तो सबकी एक-जैसी होती है न। वह क्यों भूखी रहे?
तुम्हारा-जेबकतरा भाई
माँ तो सबकी एक-जैसी होती है न। वह क्यों भूखी रहे?
तुम्हारा-जेबकतरा भाई
मेरा परिचय..
क्या लिखूं और किसके बारे में लिखूं
कभी सोचा नहीं था अपना ढोल अपने ही हाथों से पीटना पड़ेगा अर्थात् अपना परिचय स्वयं ही दूसरों को देना पड़ेगा..
मिट्टी का तन,मस्ती का मन
क्षण भर जीवन, मेरा परिचय...
पर मैं वो बात किसी को कैसे बताऊं,जो मैं खुद नहीं जानता
हाँ चाहे कितनी भी बातें लिख लूं,पर सच यही है कि मैं नहीं जानता 'मैं कौन हूँ'
कई बार सोचा,सवालों-जवाबों का सिलसिला बंधा-टूटा,कई जवाब मिले,कई नये सवाल उठे,पर ये सवाल वहीं का वहीं है
मेरे मित्र जवाब देते हैं,तुम अनिमेष हो पर, ये तो मेरा नाम है
लोग कहते हैं,तुम मनुष्य हो पर,ये तो मेरी ज़ाति है
कुछ ने कहा, तुम छात्र हो पर, ये तो मेरा व्यवसाय है
ये मेरा नाम,मेरी ज़ाति,मेरा व्यवसाय मुझसे ही तो आस्तित्व में हैं,फ़िर ये मेरा परिचय कैसे हो सकते हैं,
जिससे मेरा आस्तित्व हो,वही मेरा परिचय हो सकता है.....
तो फ़िर, मैं कौन हूँ और अगर मैं अनिमेष नहीं हूँ तो अनिमेष कौन है......
मैं भूल रहा हूँ कि मेरा एक शरीर भी है,शायद उसी का नाम अनिमेष है,शायद वही मनुष्य भी है,क्योकि उसी के दो हाथ,दो पैर,हॄदय और मष्तिष्क भी हैं.......
आईना जब गिरकर चूर हो जाता है,अपना स्वरूप खो देता है,तो फ़िर उसका नाम आईना नहीं रहता,उसे बस काँच का टुकड़ा कहा जा सकता है.आईना अपने स्वरूप के साथ नाम भी खो देता है....
तो फिर ये शरीर,जिसका नाम अनिमेष है,ये भी तो एक दिन अपना स्वरूप खो देगा,उस दिन इसका नाम क्या होगा...........शायद अनिमेष ही...,
हे प्रभु! ये कैसा विरोधाभाष है? स्वरूप खोने के बाद भी ये शरीर अपना नाम नहीं खो रहा है....
कहीं ऐसा तो नहीं,अनिमेष नाम इस शरीर का नहीं है.......
तो फ़िर किसका है.......
कुछ भी समझना मुश्किल है,कल भी मुश्किल था,आज भी.....
सवाल अभी भी वहीं खड़ा हैं,हँस रहा है मेरी बेबसी पर,अपने अविजित होने पर...
हाँ,इसके अलावा मुझे थोड़ा बहुत पता है अपने बारे में.......
मेरी Computer, Poetry,दर्शन-शास्त्र और सहित्य में गहरी रुचि है.यही मेरे जीवन का आधार है,जीने का जज़्बा है,लक्ष्य है..
अभी बहुत सफ़र तय करना है,कई मंज़िलों ,बाधाओं को पार करना है और अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना है.......
मेरा अन्तिम लक्ष्य उस सत्य को अनावॄत करना है,जो अब तक सब की आँखों से ओझल है....
क्योकि सत्य का अर्थ है,सतत् अर्थात सदा बना रहने वाला....मालूम नहीं ऐसा सत्य कहाँ मिलेगा...शायद भगवान के पास........
और अन्त में,गाइड फ़िल्म के ये शब्द मेरी ज़िन्दगी के शब्द बन गये हैं,
सवाल अब ये नहीं कि पानी बरसेगा या नहीं,सवाल ये नहीं कि मैं जिऊँगा या मरूंगा.सवाल ये है कि इस दुनिया को बनाने वाला,चलाने वाला कोई है या नहीं.अगर नहीं है तो परवाह नहीं ज़िन्दगी रहे या मौत आये.एक अंधी दुनिया में अन्धे की तरह जीने में कोई मज़ा नहीं. और अगर है तो देखना ये है कि वो अपने मज़बूर बन्दों की सुनता है या नहीं.
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