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Sunday, 30 December 2012

लो आज फिर एक फूल टूट गया जीवन की इस डाली से ..

लो आज फिर एक फूल टूट गया जीवन की इस डाली से ..
फिर आज हृदय है विचलित माँ बहनों की इस बदहाली से..

फिर छली गयी एक गुडिया इन वहशी जालिम हत्यारों से..
अब आवाज उठाओ, उठो जागो उन करुण चीख पुकारो से..

है शर्मसार मानवता,मानव के भेष में इन पिशाच मक्कारों से
धरती माँ की अब सुन लो पुकार, दब रही इन गुनहगारों से

मानव निर्माण की पहली कड़ी है जार जार अपनी बदहाली से
लो आज फिर एक फूल टूट गया जीवन की इस डाली से .

सब को जगाने वाली सो गयी तुम चिर निद्रा में दामिनी..
रहोगी तुम जीवित सदा दिलो में ,व्यर्थ न जायेगी ये कुर्बानी...